शिक्षा विभाग गबन मामला: भृत्य सिद्धार्थ जोशी ने खोले राज, अफसरों की भूमिका पर उठे सवाल
₹2.87 करोड़ के गबन में ‘ऊपर से आदेश’ का दावा, आईडी-पासवर्ड और ओटीपी सिस्टम बना जांच का केंद्र

इंदौर। स्कूल शिक्षा विभाग में सामने आए ₹2 करोड़ 87 लाख के बहुचर्चित गबन प्रकरण में मुख्य आरोपी और बीओ कार्यालय में पदस्थ भृत्य सिद्धार्थ जोशी के बयान ने मामले को नया मोड़ दे दिया है। अब तक चुप्पी साधे बैठे जोशी ने पूछताछ के दौरान संकेत दिए हैं कि यह पूरा लेन-देन अकेले उसके स्तर पर संभव नहीं था, बल्कि इसमें विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका रही है।
जोशी ने दावा किया है कि गबन की पूरी प्रक्रिया विभागीय संरक्षण में चली और समय-समय पर उससे बड़ी रकम ली जाती रही। उसने यह भी कहा कि उचित समय आने पर वह उन सभी जिम्मेदार अधिकारियों के नाम सार्वजनिक करेगा, जिनके इशारों पर यह खेल चलता रहा।
जांच में यह तथ्य सामने आया है कि वर्ष 2017 में खजराना हायर सेकेंडरी स्कूल से अटैच होकर बीओ कार्यालय में आने के बाद जोशी ने स्वयं को केवल भृत्य तक सीमित नहीं रखा। वह कंप्यूटर ऑपरेशन और वित्तीय कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाने लगा। चौंकाने वाली बात यह है कि कई अधिकारियों ने अपने गोपनीय लॉग-इन आईडी और पासवर्ड उसे उपलब्ध करा रखे थे।
सूत्रों के अनुसार, हर वित्तीय ट्रांजैक्शन के लिए आवश्यक ओटीपी संबंधित अधिकारियों की सहमति से ही दिया जाता था, जिससे उनकी भूमिका संदेह के घेरे में आ गई है। उस समय के आदेशों के आधार पर जोशी व्यवहारिक रूप से कंप्यूटर ऑपरेटर की तरह कार्य कर रहा था, जबकि उसका मूल पद चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का था।
मामले की गंभीरता को देखते हुए अब वर्ष 2016 से अब तक पदस्थ रहे सभी ब्लॉक शिक्षा अधिकारियों की भूमिका की जांच की जा रही है। वर्तमान में कार्यालयीन व्यवस्थाओं से जुड़े कुछ अधिकारी और कर्मचारी भी जांच एजेंसियों के रडार पर हैं।
जांच का मुख्य बिंदु यह है कि आखिर करोड़ों रुपये के लेन-देन किसके निर्देश पर किए गए और एक भृत्य को इतनी वित्तीय पहुंच कैसे दी गई। यदि जांच निष्पक्ष और गहराई से हुई, तो शिक्षा विभाग के कई प्रभावशाली चेहरों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।




